लॉकडाउन ने इन लोगों को बना दिया कुक, खाना बनाकर कर रहे इतनी कमाई | agra – Information in Hindi


नई दिल्‍ली. कोरोना फैलने के साथ ही भारत में हुए लॉकडाउन ने जहां लोगों की नौकरियां छीन लीं और घर पर रहने को मजबूर कर दिया. वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्‍होंने बिना किसी की परवाह किए इस समय का भरपूर सदुपयोग किया. इन्‍होंने न केवल पूरे लॉकडाउन नई-नई डिश बनाकर परिवार को खुश रखा बल्कि आज उस हुनर से कमाई भी कर रहे हैं. किसी ने शौक में तो किसी ने टाइमपास करने के लिए रसोई में हाथ बंटाना शुरू किया और धीरे-धीरे घर से बाहर तक इनके हुनर की तारीफ होने के साथ ही कुछ महीनों में इनका एक अच्‍छा खास कमाई का जरिया खड़ा हो गया.

आज भगत जी कुक के नाम से मशहूर भगत सिंह रावत कोरोना और लॉकडाउन से पहले ए‍क होटल में हॉल इंचार्ज का काम करते थे. होटल की बाहरी व्‍यवस्‍थाओं को देखने वाले भगतजी को उस वक्‍त बड़ा झटका लगा जब होटल को ही बंद करने का आदेश आ गया और वे नौकरी से हाथ धो बैठे. उन्‍हें और कोई काम भी नहीं आता था कि कर सकें. वहीं बीमारी के फैलने का भी अंदाजा था.

पैसे न होने की उलझन के बीच ही भगतजी घर पर रहकर रसोई बनाने में पत्‍नी का साथ देने लगे. कुछ दिन में उन्‍हें खाना बनाने में मजा आने लगा और मजाक मजाक में अपने दोस्‍तों से कहा कि वे तो अब घर में खाना-पीना बनाने का काम कर रहे हैं तो दोस्‍तों ने कहा कि खिलाकर दिखाओ तो बताऐं. और बस कुछ दोस्‍तों को खाना पहुंचाने के बाद उनका काम चल निकला. लोगों ने उनके खाने की खूब तारीफ की.

भगतजी कहते हैं कि मार्च से लेकर जून तक उन्‍होंने वेज खाने की हर डिश बनाना सीखा. इसके लिए उनका फोन और होटल के संपर्क काम आए. साथ ही वह ऑर्डर पाने के लिए भी  लोगों से संपर्क करते रहे. उन्‍होंने अपने होटल में काम करने वालों से लेकर कई ऑफिसों में काम करने वाले लोगों और दोस्‍तों को खाना सप्‍लाई किया. लोगों को उनका बनाया खाना पसंद आने लगा और जुलाई महीने से उन्‍होंने टिफिन सिस्‍टम शुरू कर दिया. अपने चारों बच्‍चों और पत्‍नी के साथ मिलकर उन्‍होंने रसोई को नए तरीके से तैयार किया और रोजाना सभी लोग मिलकर खाना बनाने लगे.

वे कहते हैं, ‘आज नौकरी जितना आराम तो नहीं है लेकिन इस काम से घर का खाना और खर्च चल रहा है. बच्‍चे भी खुश हैं. टिफिन में नया-नया खाना रोजाना होता है, वही बच्‍चे खाते हैं तो खुश होते हैं. यह सब देखकर हम भी अब इसी काम में सुबह शाम मन लगाकर मेहनत कर रहे हैं.’

लॉकडाउन के कुक

लॉकडाउन के कुक कमलेश जो आज गांव से शहरों में कर रहे खाने की सप्‍लाई.

लॉकडाउन में छोड़ना पड़ा शहर, अब गांव से भेज रहे 300 लोगों का खाना

सिर्फ 22 साल के कमलेश हौसले की मिसाल हैं. राजस्‍थान के सरना गांव से ताल्‍लुक रखने वाले कमलेश शहर में किराए की गाड़ी चलाते थे लेकिन लॉकडाउन में हुई बंदी के बाद इनकी गाड़ी भी बंद हो गई और इन्‍हें मजबूरी में गांव लौटना पड़ा. गांव में कोई आय का जरिया न होने पर कमलेश के सामने समस्‍या खड़ी हो गई. हालांकि रसोई में पत्‍नी का हाथ बंटाते हुए कुछ दिन गुजरे. उसी दौरान इन्‍होंने शहर में साथ काम करने वाले लोगों से बात की और जयपुर में सीमा सेठी से बात की. जिन्‍होंने कमलेश से खाना बनाकर उन्‍हें देने के लिए कहा. इस पर कमलेश अपनी पत्‍नी के साथ जुट गए और रोजाना घर में सब्‍जी रोटी बनाकर शहर भेजने लगे.

कमलेश बताते हैं, ‘इसी दौरान मैंने और भी लोगों से बातचीत जारी रखी और लोगों को टिफिन मुहैया कराने का फैसला किया. कई लोगों ने गांव का खाना लेने के लिए सह‍मति दिखाई और धीरे-धीरे हमारे खाने की मांग बढ़ती गई. आज हम रोजाना करीब 300 टिफिन शहर भेजते हैं. मैं और मेरी पत्‍नी के अलावा गांव की दो औरतें इस काम में सहयोग करती हैं. वे भी काम मिलने से काफी खुश हैं. मैं खाना बनने के बाद सुबह और शाम को सप्‍लाई करने के लिए शहर जाता हूं. घर में ही कुछ सब्जियां भी उगा रखी हैं. लिहाजा ऑर्गेनिक और शुद्ध खाना लोगों को मिल रहा है.’

लॉकडाउन के कुक, lockdown cook

लॉकडाउन की कुक अपर्णा पहले स्‍कूल में थीं प्रिंसीपल.

स्‍कूल हुए बंद तो बनाने लगीं गुजराती डिश, ईकोफ्रेंडली पैकिंग से हो रहीं लोकप्रिय

लॉकडाउन से पहले तक आगरा के राजा मंडी स्थित गोकुलपुरा में रहने वाली अपर्णा भट्ट एक प्‍लेग्रुप स्‍कूल फर्स्‍ट स्‍टैप में प्रिंसीपल थीं. 24 मार्च को हुए लॉकडाउन से पहले ही स्‍कूल बंद हो गया. इसके बाद के हालातों के बाद घर में रह रहीं अपर्णा ने करीब एक महीना इसी तरह काटा. लेकिन स्‍कूल के जल्‍दी न खुलने की संभावनाएं दिखने के बाद उन्‍हें चिंता सताने लगी. पति की प्राइवेट नौकरी और परिवार का पूरा खर्च देखकर उन्‍हें कुछ काम करने की जरूरत महसूस हुई. गुजरात से जुड़ी होने के कारण लॉकडाउन में पड़ी हाटकेश्‍वर जयंती पर घर आए मेहमानों ने जब उनके श्रीखंड, खांडवी और खाखरा की तारीफ की तो उन्‍हें आइडिया मिल गया और उन्‍होंने गुजराती खाने की सप्‍लाई करने का फैसला किया. आखिरकार गुज्जूस ऑफ आगरा नाम से उन्‍होंने ऑनलाइन ऑडर्स के लिए प्‍लेटफॉर्म बनाया और श्रीखंड, खांडवी और खाखरा बनाने लगीं.

अपर्णा बताती हैं कि आगरा में रहने वाले डॉक्‍टरों का इन्‍हें लेकर बहुत अच्‍छा रेस्‍पॉन्‍स आने लगा. इसके बाद उनके आयटम आगरा, फिरोजाबाद और यहां तक कि इंदौर तक पहुंचने लगे. लोग अब उनके बनाए गुजराती आइटमों को काफी पसंद करते हैं.

अपर्णा बताती हैं, ‘इसके लिए मैंने एक और खास चीज की और वह यह थी कि प्‍लास्टिक में पैकिंग के बजाय ईको फ्रेंडली, मटकों और कुल्‍हड़ों में पैकिंग करना शुरू किया. इससे न केवल उन लोगों को भी रोजगार मिला जो मिट्टी के बर्तन बनाते हैं बल्कि लोगों को भी बहुत पसंद आया. आज हालात यह हैं कि पांच से छह किलो श्रीखंड और कई किलो खाखरा और खांडवी की की रोजाना सप्‍लाई हो जाती है. मेरे पति शाम को घर आकर सप्‍लाई करते हैं. इसके स्‍वाद को लेकर लोग तारीफ करते हैं तो बहुत अच्‍छा लगता है साथ ही कमाई भी हो रही है. महीने में करीब 100 मटकी हमारी लग जाती हैं. ऐसे में मटकी बनाने वाले भी काफी खुश हैं.’

लॉकडाउन के कुक, cook of lockdown

टैक्‍सी हुई बंद तो सीताराम ने संभाल ली रसोई. आज कमा रहे खाना बनाकर पैसा.

भाड़े की टैक्‍सी बंद हुई और आखिर में खाना बनाना ही आया काम

जयपुर में सीताराम कुक के नाम से जाने जा रहे सीताराम आज खुश हैं. कोरोना महामारी आने और लॉकडाउन होने के बाद दो बेटों के पिता सीताराम के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह अपने बच्‍चों की ऑनलाइन पढ़ाईके लिए स्‍कूल की फीस भर सकें. आखिरकार उनके बच्‍चों का स्‍कूल से नाम कट गया. लॉकडाउन में पूरा भारत बंद होने के बाद भाड़े की टैक्‍सी चलना भी बंद हो गया. अप्रैल के शुरूआत तक इंतजार किया कि शायद लॉकडाउन खुले लेकिन हालात और खराब होने पर टैक्‍सी को मालिक के पास जमा कराना पड़ा.

सीताराम आगे बताते हैं कि इसके बाद घर में रहते हुए कोई और काम न होने पर खाना-पीना बनाना शुरू किया. हालांकि खाना बनाने के शौक के बावजूद पैसों की तंगी भी आड़े आई. जिसके बावजूद मोबाइल फोन में सर्च कर कर के नए नए व्‍यंजन बनाना सीखा. बच्‍चे नई-नई चीजें खाकर काफी खुश होते थे. इस दौरान आमतौर पर मिलने वाले साउथ इंडियन, चाइनीज और इटैलियन फूड बनाना सीख लिया. जून के महीने में जब कुछ जगहों पर काम शुरू हुआ और बाहर का खाना सब बंद था तो उन्‍होंने लोगों से खाने का ऑर्डर देने के लिए बात की और लोग राजी हो गए. दो लोगों को खाना देने से शुरू हुआ सफर दो महीने के भीतर ही 50 टिफिन तक पहुंच गया.

सीताराम कहते हैं कि अभी वे, उनकी पत्‍नी और बच्‍चे सभी मिलकर खाना बनाते हैं. जब पैसे ठीक-ठाक आने लगेंगे तो सबसे पहले बच्‍चों की पढ़ाई कराएंगे.पहले बच्‍चों की पढ़ाई कराएंगे. वे कहते हैं कि कोरोना ने ही उन्‍हें कठिनाई में डाला था लेकिन इसी कोरोना के कारण आज वह नया काम कर रहे हैं और यह काफी चल भी रहा है. वे कहते हैं कि यह शायद ऐसा काम है जो कभी बंद नहीं होगा.

पेशे से कंपनी सेक्रेटरी, लॉकडाउन के बाद उनकी मठ्ठियों के दीवाने हुए लोग

पहले स्‍कूल मे टीचर और फिर कंपनी सेक्रेटरी बनने के बाद जब कोरोना आया तो उर्वशी सहगल के जीवन में भी परिवर्तन आ गया. बच्‍चा छोटा होने पर बाहर जाकर कोई भी काम करना पहले ही बहुत मुश्किल था लेकिन लॉकडाउन ने इसे और कठिन कर दिया. हालांकि घर में रहते हुए उर्वशी ने कुछ नया करने की ठानी और अपनी मां से लॉकडाउन में मठ्ठियां बनाना सीख लिया. उर्वशी बताती हैं, मैंने पहले कभी मठ्ठियां नहीं बनाई थीं, हां मां को जरूर बनाते हुए देखती थी. लॉकडाउन में और तो कहीं जाना होता नहीं था, कंपनी का भी काम लगभग बंद था तो रसोई में कुछ नया सीखने लगी. आखिरकार मम्‍मी से मैथी, पुदीने की मठ्ठी, खस्‍ता मठ्ठी आदि सीखने लगी. घर आने वाले दो चार लोगों को जब मठ्ठी खिलाई तो उन्‍होंने स्‍वाद की तारीफ की. वहीं लॉकडाउन के चलते स्‍नैक्‍स आदि बाजार से लेने में भी लोग घबरा रहे थे. लिहाजा मैंने मठ्ठियों की होम डिलीवरी शुरू कर दी और जयपुर की अपनी रंगोली कॉलोनी में ही सप्‍लाई करने लगी. लोग मेरी मठ्ठियों को काफी पसंद कर रहे हैं और रोजाना ऑर्डर भी आ रहे हैं. वहीं मेरे पति ऑफिस से आने के बाद लोगों के घर पर डिलीवरी करते हैं.





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